तीसरी दुनिया या ग्लोबल साउथ के मसीहा का अंत : क्या भारत ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका स्वयं त्याग दी?
तीसरी दुनिया या ग्लोबल साउथ के मसीहा का अंत क्या भारत ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका स्वयं त्याग दी? (संपादकीय) एक समय था जब भारत को “तीसरी दुनिया की अंतरात्मा” कहा जाता था। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नवस्वतंत्र राष्ट्र भारत की ओर केवल एक देश के रूप में नहीं, बल्कि एक नैतिक नेतृत्व के रूप में देखते थे। गुटनिरपेक्ष आंदोलन, उपनिवेशवाद के विरुद्ध स्वर, रंगभेद के खिलाफ संघर्ष और विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़—इन सबके केंद्र में भारत था। आज वही भारत अमेरिका के साथ ऐसे समझौतों में बंधता दिख रहा है, जिनमें न समानता है, न स्वायत्तता और न ही उस ऐतिहासिक नैतिक दृष्टि की झलक, जिसने कभी भारत को “ग्लोबल साउथ का मसीहा” बनाया था। सवाल यह नहीं है कि भारत अमेरिका के साथ रिश्ते क्यों बढ़ा रहा है। सवाल यह है कि क्या वह इन रिश्तों की कीमत पर अपनी ऐतिहासिक भूमिका गंवा रहा है? तीसरी दुनिया से ग्लोबल साउथ तक: भारत की ऐतिहासिक भूमिका “तीसरी दुनिया” शब्द शीतयुद्ध की उपज था—न अमेरिका के साथ, न सोवियत संघ के साथ। भारत ने इस अवधारणा को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक अर्थ दिया। नेहरू, नासिर, टीटो और सुकर्ण...