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Attacks on Democracies and Embrace of Dictators | Global Democracy in Crisis

  दुनिया के लोकतंत्रों पर हमले और तानाशाहों के साथ गलबहियां | वैश्विक लोकतंत्र संकट Attacks on Democracies and Embrace of Dictators | Global Democracy in Crisis Global Democracy Crisis, Rise of Authoritarianism) इक्कीसवीं सदी को कभी लोकतंत्र की सदी कहा गया था। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद यह विश्वास गहराया कि अब दुनिया निरंकुशता से मुक्त होगी, शासन जनता के प्रति जवाबदेह होगा और मानवाधिकार सार्वभौमिक मूल्य बनेंगे। लेकिन आज वही सदी लोकतंत्र के सबसे गंभीर संकट की सदी बनती जा रही है। दुनिया के कई हिस्सों में लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर की जा रही हैं, निर्वाचित नेताओं को बदनाम किया जा रहा है और सत्ता के केंद्र तानाशाहों के साथ खुले या छिपे रूप में गलबहियां कर रहे हैं। यह केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सभ्यतागत संकट है। लोकतंत्र: एक असुविधाजनक व्यवस्था / Democracy as an Inconvenient System (SEO Focus: Why Democracy is Under Threat) लोकतंत्र सत्ता के लिए कभी सहज व्यवस्था नहीं रहा। यह प्रश्न करता है, रोकता है, संतुलन बनाता है और समय लेता है। संसद में बहस, न्यायपालिका की समीक्षा, मीडिया क...

India’s Silence and the American Strategic Playbook

भारत का मौन और अमेरिकी रणनीति India’s Silence and the American Strategic Playbook प्रस्तावना: चुप्पी भी एक नीति होती है Introduction: Silence Is Also a Policy अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हर हमला मिसाइल से नहीं होता। कई बार हमला बयान से होता है, कई बार प्रतिबंध से, और कई बार—चुप्पी से। जब कोई देश अन्याय के सामने चुप रहता है, तो वह केवल उस अन्याय को स्वीकार नहीं करता, बल्कि भविष्य में अपने साथ होने वाले अन्याय का रास्ता भी साफ़ करता है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ जो हुआ, उसे केवल एक “तानाशाह बनाम लोकतंत्र” की कहानी मान लेना ऐतिहासिक भूल होगी। वह दरअसल एक रणनीतिक मॉडल था—एक ऐसा मॉडल जिसे अमेरिका उन देशों पर आज़माता है जो उसकी तय की गई वैश्विक सीमाओं से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। भारत आज उसी संक्रमण बिंदु पर खड़ा दिखाई देता है। फर्क इतना है कि भारत वेनेजुएला नहीं है—लेकिन क्या रणनीति बदली है? यह सवाल आज भारत के मौन, उसकी तथाकथित तटस्थता और अमेरिका के बदलते सुरों को देखकर और भी गंभीर हो जाता है। चीन–पाकिस्तान–बांग्लादेश: घेराव नहीं, अवसर China–Pakistan–Bangladesh: Not an...

India’s Silence and the American Strategic Playbook

 भारत का मौन और अमेरिकी रणनीति India’s Silence and the American Strategic Playbook प्रस्तावना: चुप्पी भी एक नीति होती है Introduction: Silence Is Also a Policy अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हर हमला मिसाइल से नहीं होता। कई बार हमला बयान से होता है, कई बार प्रतिबंध से, और कई बार—चुप्पी से। जब कोई देश अन्याय के सामने चुप रहता है, तो वह केवल उस अन्याय को स्वीकार नहीं करता, बल्कि भविष्य में अपने साथ होने वाले अन्याय का रास्ता भी साफ़ करता है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ जो हुआ, उसे केवल एक “तानाशाह बनाम लोकतंत्र” की कहानी मान लेना ऐतिहासिक भूल होगी। वह दरअसल एक रणनीतिक मॉडल था—एक ऐसा मॉडल जिसे अमेरिका उन देशों पर आज़माता है जो उसकी तय की गई वैश्विक सीमाओं से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। भारत आज उसी संक्रमण बिंदु पर खड़ा दिखाई देता है। फर्क इतना है कि भारत वेनेजुएला नहीं है—लेकिन क्या रणनीति बदली है? यह सवाल आज भारत के मौन, उसकी तथाकथित तटस्थता और अमेरिका के बदलते सुरों को देखकर और भी गंभीर हो जाता है। चीन–पाकिस्तान–बांग्लादेश: घेराव नहीं, अवसर China–Pakistan–Bangladesh: N...

America’s War on Venezuela: The Maduro Case

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वेनेजुएला पर अमेरिका का युद्ध : मादुरो प्रकरण War Without Declaration Venezuela  बिना घोषणा का युद्ध युद्ध की परंपरागत परिभाषा अब अप्रासंगिक हो चुकी है। अब युद्ध केवल मिसाइल, बम और सैनिक टकराव तक सीमित नहीं रहा। आधुनिक युद्ध का स्वरूप बदल चुका है—कानूनी, आर्थिक और नैरेटिव युद्ध के माध्यम से किसी देश की संप्रभुता को कुचला जाता है। वेनेजुएला पर अमेरिका का दबाव इस नए यथार्थ का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। यह एक ऐसा युद्ध है जिसे अमेरिका ने घोषित नहीं किया, पर प्रभाव में यह प्रत्यक्ष युद्ध से कम नहीं है। अमेरिकी रणनीति का लक्ष्य केवल मादुरो को हटाना नहीं था; इसका उद्देश्य था—वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था, सामाजिक तंत्र और अंतरराष्ट्रीय वैधता को कमजोर करना। बम नहीं गिरे, सैनिक नहीं उतरे, लेकिन देश लगातार युद्ध की स्थिति में रहा। Maduro and the Question of Legitimacy मादुरो और वैधता का प्रश्न निकोलस मादुरो निर्वाचित राष्ट्रपति हैं। यह तथ्य राजनीतिक विवादों से स्वतंत्र है। आलोचना हो सकती है, चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन किसी देश के चुने हुए राष्ट्रपति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपराधी घो...

निर्वाचित राष्ट्रपति का अपहरण : मादुरो

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  क्या यह युद्ध नहीं है? (वेनेज़ुएला और आधुनिक साम्राज्यवादी आक्रामकता का प्रश्न)** भूमिका: युद्ध की बदली हुई परिभाषा इक्कीसवीं सदी में युद्ध अब वैसा नहीं रहा, जैसा बीसवीं सदी में समझा जाता था। अब युद्ध की शुरुआत न तो तोपों की गर्जना से होती है, न ही सीमाओं पर सेनाओं की औपचारिक तैनाती से। आज युद्ध अक्सर अदालतों, प्रतिबंधों, गिरफ्तारी वारंटों, आर्थिक नाकेबंदियों और “लोकतंत्र बचाने” की नैतिक भाषा में लड़ा जाता है। यह युद्ध कम दिखाई देता है, लेकिन अधिक गहराई तक असर करता है। ऐसे समय में एक प्रश्न असहज होकर सामने खड़ा होता है— यदि किसी लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित राष्ट्रपति को बलपूर्वक हिरासत में लिया जाए, जेल में डाला जाए और किसी विदेशी अदालत में पेश किया जाए, तो इसे क्या कहा जाए? क्या यह कूटनीति है? क्या यह कानून का शासन है? या फिर यह युद्ध का ही एक नया, अधिक परिष्कृत और अधिक खतरनाक रूप है? वेनेज़ुएला का संदर्भ इसी प्रश्न को वैश्विक विमर्श के केंद्र में ले आता है। 1. युद्ध केवल बम नहीं होता: अंतरराष्ट्रीय कानून का मूल सिद्धांत संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) के अनुच्छेद 2(4) के अ...

Middle East and Venezuela Oil Politics

 <!DOCTYPE html> <html lang="hi"> <head> <meta charset="UTF-8"> <title>जहाँ तेल, वहाँ अमेरिकी खेल | Middle East and Venezuela Oil Politics</title> <meta name="description" content="मध्यपूर्व और वेनेज़ुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप का वास्तविक कारण क्या है? यह विश्लेषणात्मक लेख तेल, शक्ति और वैश्विक राजनीति के अमेरिकी खेल को उजागर करता है।"> <meta name="keywords" content="अमेरिका और तेल राजनीति, Middle East Oil Politics, Venezuela Oil Crisis, अमेरिकी हस्तक्षेप, वैश्विक सत्ता, तेल और युद्ध"> <meta name="author" content="Rajiv Ranjan"> <link rel="canonical" href="https://ghazipursamwad.com/jahan-tel-wahan-ameriki-khel"> <!-- Open Graph --> <meta property="og:title" content="जहाँ तेल, वहाँ अमेरिकी खेल"> <meta property="og:description" content="मध्यपूर्व और वेनेज़ुएला के उदाहरणों से अमेरि...

Silence of Buddhist Nations and China’s Tibet Policy

 दुनिया के बौद्ध देशों की चुप्पी और चीन की तिब्बत नीति Silence of Buddhist Nations and China’s Tibet Policy भूमिका | Introduction बौद्ध धर्म को सामान्यतः करुणा, अहिंसा, सहअस्तित्व और नैतिक साहस का दर्शन माना जाता है। गौतम बुद्ध का संदेश केवल आत्म-मुक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि वह अन्याय, दमन और सत्ता के अहंकार के विरुद्ध एक मौन लेकिन दृढ़ प्रतिरोध भी था। इसके बावजूद आज जब तिब्बत जैसे बौद्ध सभ्यता के मूल केंद्र पर राज्य-प्रायोजित नियंत्रण, सांस्कृतिक क्षरण और धार्मिक दमन जारी है, तब दुनिया के अधिकांश बौद्ध-बहुल देश लगभग पूर्ण चुप्पी साधे हुए हैं। यह चुप्पी साधारण कूटनीतिक विवशता नहीं, बल्कि एक गहरे नैतिक और वैचारिक संकट का संकेत है। तिब्बत: बौद्ध सभ्यता की आत्मा | Tibet: The Soul of Buddhist Civilization तिब्बत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा है। सदियों तक वह महायान और वज्रयान बौद्ध परंपरा का जीवंत केंद्र रहा, जहाँ धर्म केवल आस्था नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक जीवन का आधार था। मठ शिक्षा के केंद्र थे, लामा नैतिक मार्गदर्शक थे और दलाई लामा की संस्था आध्यात्मिक नेतृत्व क...